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अंग्रेजों ने थाना का निर्माण सिहावा में क्यों किया ? जानिए सिहावा थाना का इतिहास ! Sihawa Tahna Ki Itihas


सिहावा थाना - सिहावा नगरी Sihawa Thana ( Sihawa Nagri )

दोस्तो आज हम इस पोस्ट के मदद से जानने वाले है की सिहवा की प्राचीन थाना का इतिहास के बारे मे क्योकि हमारे नगरी-सिहावा प्राचीन काल से ही कई सारे पौराणिक कथा से जुड़ी है । तो चलिये हम जानने का प्रायस  करते है । और पोस्ट को लास्ट तक जरूर पढे -

अंग्रेजों ने थाना का निर्माण सिहावा में क्यों किया ?

किसी भी गांव शहर की शांति व्यवस्था वहां की प्रशासन व्यवस्था पर निर्भर करती है, सिहावा एक ऐसा तीर्थ स्थान है जहां पर शांति ही शांति है। सतयुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग से यह क्षेत्र शांतिमय रहा है जिसके कारण ऋषि मुनियों ने यहां आकर तपस्या की, यह बात तो निर्विवाद सत्य है।

सिहावा  की एतिहासिक पढने से पता चलता है कि चौथी शताब्दी में महाराज समुद्रगुप्त भारत विजय के समय से लेकर आज तक सिहावा में खुन खराबा नहीं हुआ है और ही कोई दंगा फसाद फिर भी सिहावा में अंग्रेजों ने थाना का निर्माण क्यों किया ?

आरक्षी केन्द्र सिंहावा के पुराने अपराधिक मामले का वलोकन करने पर पता चलता है कि सिहावा ग्राम के आस पास अन्य ग्रामों में तो चोरी हुई है डाका पड़ा है और ही संगीन कत्ल का मामला सामने आया है फिर भी सिहावा में आरक्षी केन्द्र है। 

आरक्षी केन्द्र सिहावा में होने में भी विभिन्न मत है -

 सन् 1345 से 1367 ईसवी तक कर्णा जाति के राजा के अधीन सिहावा क्षेत्र रहा परन्तु 1324 में बारंगल के राजा प्रताप देव का भाई अन्नम देव बस्तर से सिहावा क्षेत्र में प्रवेश कर अपना क्षेत्र बनाया जहां पर आरक्षी केन्द्र है। वहीं पर सुरक्षा गृह का निर्माण करवाया और सुरक्षा गृह में रणचण्डी देवी और खम्बेश्री विराजमान हुए और उस सुरक्षा गृह के आसन पर बैठकर उनके सरदार नायक न्याय व्यवस्था देखते थे तब से उनके बाद जितने भी राजा हुए चाहे बस्तर महाराजा के वंशज थे या मोसला शासक हो। सभी राजा के समय उसी स्थान पर न्याय व्यवस्था होती थी। 

फिर राजा भैरमदेव के समय (ईसवी सन 1853) से सिहावा क्षेत्र ब्रिटिश कंपनी के हाथ में चला गया और उस स्थान पर न्याय के जगह अन्याय होने लगा फिर भी अंग्रेजों ने उस स्थान को नहीं छोड़ा। सन् 1891 से 1921 के बीच बस्तर का राजा अल्प वयस्क रूद्रप्रताप देव हुए परन्तु कानून व्यवस्था पूरी अंग्रेजों के हाथ में थी। राजा रूद्रप्रताप देव का दीवान बैजनाथ पड़ा जो अंग्रेजों का पिट्टू था वह अपने बेतुकी आदेशों से प्रजाजन की मुश्किलें बढ़ा देता और उनका मनमाना शोषण और अत्याचार करता था। धीरे धीरे जनता में असंतोष पनपने लगा और जनता ने राजा रूद्रप्रताप देव के बाबा लाला कालेन्द्र सिंह और रानी स्वर्ण कुवर के साथ 

अंग्रेजो की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिए एक आदिवासी युवक गुंडाघुर के नेतृत्व में सम्पूर्ण बस्तर कांकेर सहित सिहावा क्षेत्र के आदिवासी नवजवान संकल्प बद्ध हुए जिसका नाम दिये भूमकाल। इस भूमकाल का सिहावा क्षेत्र में नेतृत्व कर रहे थे आदिवासी बुजुर्ग चाली राम गोड. मुडरा राम गोड, माँझी गोड़ (बेलर) इनके नेतृत्व में शासकीय रिकार्ड के अनुसार 1965 से अधिक तथा बिना रिकार्ड के हजारों नवयुवक भूमकाल में शामिल हो गये जिसमें सिर्फ आदिवासी ही नहीं अन्य जाति के लोगों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।

 इसकी जानकारी अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर रायपुर मिस्टर चार्ल्स सी इलियट के कानों तक पहुंची और मि. मेन्सल ब्रिटिश कमिश्नर के आदेश पर आनन फानन में भूमकाल के दमन के लिए सन 1895 में थाना की शुरूआत करवा दिया और राजा अन्नम देव द्वारा निर्मित भवन को तोड़ मरोड़ कर थाना का रूप दिया गया (सन् 1906) और 14 परगना के नाम पर पुलिस चौकी स्थापित किये परन्तु जहा पर रणचण्डी देवी विराजमान थी उस स्थान को खभे से चुनवा दिया गया। जिसके कारण अंग्रेजों के साथ जो भवन निर्माण कार्य कर रहे राज मिस्त्रियों को भी कष्ट सहन करना पड़ा एवं अंग्रेजों को भूमकालों से हारना पड़ा।

 लोगों का कहना है कि जिस समय भूमकाल और अंग्रेज पुलिस के बीच मुठभेड़ हुआ था तब अंग्रेजों द्वारा बन्दुक से चलाई गयी कारतुस नहीं फटता था और भूमकालों द्वारा चलाई गयी तीर माला अंग्रेजों के प्राण पखेरू ले उड़ते थे।

ब्रिटिश शासन और भूमकालों के बीच बढ़ती रजिश को देखकर इस क्षेत्र के मालगुजारों एवं बुद्ध जीवियों ने ब्रिटिश शासन को एक आवेदन लिखा गया, जिसमें शर्त रखा कि

 1. हमारे शस्त्रधारी जिन्हें भूमकाल कहते हैं उन्हें दशहरा पर्व पर देवताओं का पूजा अर्चना की पूरी छूट दिया जाय।

 2. विजय एकादशी दशहरा के दिन जो आदिकाल से चला रहा है उस दिन सभी शस्त्रधारियों को अपने शक्ति प्रदर्शन करने का अखाड़ा में ठी चाल तलवार चाल एक बंदुक से चांद मारी जैसे धार्मिक कार्यों में शक्ति प्रदर्शन करने की पूरी छूट दी जाए।

3 कर (लगान) में कुछ रियायतें दी जाय साथ ही आम जनता के साथ बरबरता पूर्ण व्यवहार किया जाय।

 अतः महानुभाव से आग्रह है उक्त शर्तें आपको कबूल हो तो हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि भूमकालों द्वारा शासन व्यवस्था में किसी प्रकार की व्यवधान नहीं होगी।

 मि.मेन्सल (कमिश्नर) बहुत चालाक था वह सिहावा क्षेत्र के वासियों के सत्यवादिता और आदर्शवादिता से भली भांति परिचित था, क्योंकि कभी-कभी वह इस क्षेत्र में शिकार खेलने आया करता था। अतः उसने इस क्षेत्रवासियों के शर्त को मंजूर कर लिया।

 तब से सिहावा आरक्षी केन्द्र में दशहरा के दिन सभी शस्त्रधारियों को थाना प्रभारी की ओर से सम्मान के रूप में तिलक लगाकर पगडी बाधने एवं श्री फल से सम्मानित किया जाता है। यह परम्परा राजा अन्नम देव के समय से चली रही थी।

 सिहावा आरक्षी केन्द्र (पुलिस थाना) में शांति व्यवस्था के साथ देवी मंदिर है । 

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