सिहावा गढ़ शीतला में दशहरा मनाने का अनोखा ढंग



सिहावा गढ़ शीतला में  दशहरा मनाने का अनोखा ढंग

 

त्यौहार मनाने की परम्परा अपने अपने गांव शहर का अलग अलग ढंग होता है। प्रत्येक त्यौहार हर गांव में थोड़ा थोडा भिन्नता अवश्य देखने को मिलता है सिहावा का दशहरा इन्ही भिन्नताओं में से एक है। क्वार शुक्ल पक्ष विजयाएकादशी के दिन प्रातः काल कुम्हार द्वारा कच्ची मिट्टी से रावण का पुतला मनुष्य आकार में बनाया जाता है। जो पुर्ण रूप से निर्वस्त्र अवस्था में रहता है। सयानों से जानकारी के अनुसार जो कुम्हार रावण का पुतला बनाता है वह पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं के वंशज बना रहा है।

 

क्वार शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि से ही भूमकाल बंधुओं का सिहावा गढ़ में आना प्रारंभ हो जाता है। वे पुरे बाजे गाजे के साथ हथियार सहित (तलवार, माले, लाठी बन्दुक) होकर आते हैं। नायक के घर में द्वादशी तिथि तक निवास करते हैं। नवमी तिथि से भूमकाल बंधु अपने अपने हथियारों की पुजा पाठ

 

प्रारम्भ कर देते हैं और एकादशी तिथि को स्नान भाजन आदि से निवृत होकर बाजे गाजे के साथ नायक परिवार की आराध्य देवी जिनके नाम पर दो धारी वाली खडग जो कि राजा अन्नम देव द्वारा प्रदत्त नायक के पूर्वज मुरहा और पोटहा जो राजा अन्नम देव के सेना नायक थे। उन दोनों तलवारों को लेकर सभी भूमकाल वीर जुलुस के रूप में अपने अपने हथियारों को भाजते हुए निकल पड़ते हैं साथ ही साथ आस पास के सभी ग्रामों से देवी देवता बाजे गाजे के साथ निकल पड़ते हैं और माता भुरसी मावली माँ दन्तेश्वरी के ध्वजा को साथ में लेकर सभी मोकला माँझी बाबा के पास इकट्ठा होते हैं। सभी मिलकर ग्राम पटेल यदु के घर जाते है जहां सभी का सम्मान होता है फिर थाना की ओर प्रस्थान करते हैं। थाना पहुंच कर वहां विराजमान खम्भे श्री की पूजा अर्चना के पश्चात् थाना प्रभारी द्वारा सभी देवताओं भूमकाल बंधुओं सहित गणमान्य जनों का तिलक लगाकर पगड़ी बांधी जाती है। यह परम्परा थाना निर्माण के पूर्व राजा के प्रभारी द्वारा किया जाता था। सन् 1885 से ब्रिटिश शासन से लेकर अब तक थाना प्रभारी द्वारा स्वागत किया जाता है।

 

तत्पश्चात् थाना प्रभारी को साथ में लेकर चांद मारी के लिये महानदी उद्गम स्थल तक जाते हैं, जहा चांदमारी की रस्म अदा की जाती है। यह बाद मारी क्या है

 माँ शीतला के दरबार की ओर प्रस्थान करते हैं। मंदिर में स्वागत द्वार पर सभी का माँ शीतला भवानी की ओर से पुजारी द्वारातिलक वंदन पुष्प हार से स्वागत होता है। सभी माँ के दरबार में पहुंच पुष्पाजली अर्पित करते हैं और रावण वध हेतु माँ से प्रार्थना करते हैं। माता जी आदेशानुसार पुजारी माँ भगवती शीतला के खडग को लेकर आगे आगे चलता है उनके पीछे सभी देवी देवता चलते हैं और रावण भाठा पहुंचते हैं वहां पर पुनः माता जी के खडग का अभिषेक किया जाता है। तत्पश्चात् पुजारी द्वारा माता के खडग को लेकर भांजते हुए कच्ची मिट्टी से निर्मित नग्न रावण का सात प्रदक्षिणा पुजारी द्वारा की जाती है और रावण का कत्ल खड्ग द्वारा वध किया जाता है। जैसे ही माता जी के खड्ग से कच्ची मिट्टी से निर्मित नग्न रावण का सर धड़ से अलग होता है तुरन्त सभी जन समुदाय रावण के शरीर के मिट्टी के लोदा को थोड़ा थोड़ा उठा लेते हैं और उसी कच्ची मिट्टी से एक दूसरे के माथे

 

पर तिलक लगाकर गले मिलते हैं और दशहरा की शुभकामनाएं देते हैं। रावण का वध होते ही माँ भवानी शीतला के खडग को लेकर पुजारी मंदिर की ओर प्रस्थान करता है उसके पीछे पीछे सभी देवी देवताओं के साथ जुलुस माँ भगवती शीतला के जयघोष के साथ आते हैं मंदिर द्वार पर माँ भगवती शीतला के खड्ग के साथ सभी देवी देवताओं का स्वागत होता है और माँ शीतला के उसी खड्ग के द्वारा स्वागत द्वार पर ही कष्माण्ड बलि की रश्म अदा होती है। फिर माता के खड्ग को माँ शीतला को समर्पित किया जाता है और जन समुदाय के द्वारा वह मिट्टी जो रावण के पुतला से निकाला हुआ को माँ शीतला को भेंटकर बचे हुए मिट्टी को घर लाया जाता है और पूजा के स्थान पर या तिजोरी में भरकर आगामी दशहरा तक रखा जाता है। माँ शीतला को पुष्पांजली अर्पित के पश्चात् माँ शीतला भवानी की ओर से पुजारी द्वारा सभी देवी देवताओं एवं गणमाण्य जनों को श्री फल भेंट कर सादर विदाई दी जाती है इस तरह से अनोखा दशहरा सिहावा में देखने को मिलता है।

  दशहरा पर्व प्राय: सभी प्रान्तों के सभी गांवों शहरों में मनाया जाता है

 

परन्तु किसी भी पर्व को मनाने में किसी स्थान की एक विशिष्टता होती है वह स्थान अपने आप में विशेष पात्रता रखता है। भारत के सभी जगहों पर क्वार महीने के शुक्ल पक्ष विजयादशमी को दशहरा वर्ष मनाया जाता है। सभी स्थानों में भगवान श्री राम द्वारा लंका पति दस शीष वाले रावण का वध होता है। उसी उपलक्ष्य में विजयादशमी पर्व मनाया जाता है परन्तु सिहावा कार सभी जगहों से भिन्न मनाया जाता है। दशहरा के दूसरे दिन अर्थात महीने के शुक्ल पक्ष के एकादशी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। रावण का वध माँ भगवती शीतला के खड़ग से होता है रावण का पुत कच्ची मिट्टी से उसी दिन निर्माण किया जाता है तथा रावण के शरीर कोई भी वस्त्र आदि नहीं रहता अर्थात वह रावण का मूर्ति पूर्ण रूप से नग्न अवस्था में बनाया जाता है मर्यादा को ध्यान में रखते हुए उस दिन महिलाएं उस स्थान तक नहीं जाती। सयानों से मिली जानकारी कथाकार से सुनी कथा विलंका रामायण (उडिया रामायण) आनंद रामायण के प्रमाण के अनुसार भगवान श्री राम के 14 वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या में श्री राम राज्य अभिषेक होता है और भगवान राम सुख राज्य संचालन करने लगे।

 

एक दिन माता सीता बगीचे के विहार कर रही थी उसी संखियों द्वारा कौतुहल वश पुछा जाता है कि हे महारानी आप रावण के राज्य में 9 महीने रहीं आप रावण के बारे में क्या क्या और जानती है। हमने सुना है कि रावण जब चलता था तो पृथ्वी

 

डगमगाने लग जाती थीं और जब हसता था तो गर्भवती महिल का गर्भ गिर जाता था। कृपा करके हमें रावण की आकृति बनाकर बजाने का कृष्ट करें। तब माँ जानकी जी कहती हैं कि मैं रावण की ओर देखी भी नहीं हूँ। मैं उसक शारीरिक माप दण्ड के बारे में कुछ भी नहीं बढ़ सकती। तब सखियाँ और अधिक जिद्द करने लगी कि आप हमें कुछ बताने की कृपा करें। सखियों अनुरोध को माँ सीता ठकरा और रावण के बारे में बतलाने लगी। तब सखियाँ पुनः प्रश्न करती है और प्रार्थना करती है कि कृपा कर आप कच्ची मिट्टी से छोटे से तला बनाकर आप हमें समझाने का कष्ट करें तब माता जानकी जी उसी बगीचे हे फूलवारी से कच्ची मिट्टी लेकर एक मानव नुमा रावण का एक पुतला बनाई तब सखिया पुनः अनुरोध करती है कि इस मिट्टी के पुतले को अट्टाहस कराकर दिखाने की कृपा करें। तब माँ जानकी जी उस मिट्टी के पुतले में मंत्रोचारण कर प्राण फेंक देती है


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