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कर्णेश्वर धाम (देवुरपारा -सिहावा ) मे स्थित अमृत कुण्ड जानिए इस कुण्ड की पौराणिक कथा -

कर्णेश्वर धाम सिहावा नगरी

 अमृत कुण्ड कर्णेश्वर धाम  -

कर्णेश्वर मंदिर के समीप  ही एक अमृत कुण्ड है ,जो अभी भी सुरक्षित है  किवदंती है कि सोमवंशी राजा कन्हार देव कोढ़ ग्रस्त थे जो अमृत कुण्ड के कीचड़ से ठीक हुये थे । 


पौराणिक कथा -
कहा जाता है कि 1100 शक संवत के लगभग में कलिंग राजा के सात पुत्र थे जिसमें 6 राजकुमार थे और एक दासी पुत्र था। राजा अपने राज्य का सही संचालन, जन सेवा और जो राजा की मर्यादा को कायम रख सके। 



राज गद्दी देने के लिए योग्य पुत्र का चयन करने में राजा को कठिनाई हो रही थी, तब राजा ने अपनी कुल देवी आदि शक्ति महामाया से प्रार्थना किया की हे माँ मुझे उचित मार्ग दर्शन दें।

कुल देवी आदि शक्ति ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिये और कहा कि तुम अपने सातों पुत्र के साथ मेरे मंदिर में दर्शन के लिये आओ, आते समय रास्ता में अपने अगोछा को गिरा देना, जो पुत्र उस अगोछे को उठा कर तुम्हे देगा उसे ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी मान कर राजगद्दी सौप देना।

आदि शक्ति के आज्ञानुसार राजा प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत होकर अपने सातों पुत्रों के साथ इष्ट देवी के मंदिर में दर्शन करने गये और बीच रास्ते में ही अपने अगोछे को गिरा दिया। उस अंगोछे को छह राजकुमार नही उठाये। सातवाँ दासी पुत्र राजकुमार उस अंगोछे को उठा कर राजा को दिया। राजा मंदिर में आदि शक्ति का अपने पुत्रो सहित दर्शन कर वापस राज दरबार में आये और देवी के आदेशानुसार दासी पुत्र को राजगद्दी का यवराज बनाने की घोषणा कर दिया। 

दूसरे दिन दासी -पुत्र का राज तिलक कर दिया। राजा द्वारा दासी पुत्र को राजतिलक एवं राजगद्दी सौपने के बाद, बड़ा पुत्र क्रोधित होकर दासी पुत्र का वध करने के लिये रात में तलवार लेकर गया।उनके इस कृत्य को देख के इष्ट देवी महामाया कुपित हो गई जिसमें राजा का बड़ा पुत्र तत्काल कोढ़ ग्रस्त हो गया



वही कोढ़ ग्रस्त राजकुमार अपने एक कुत्ता के साथ पश्चाताप् करते हुये शेष जीवन बिताने तपोभूमी सिहावा के कर्णेश्वर स्थल पर पहुँचे। और देवपुर ग्राम के पास कुटिया बना कर रहने लगे। राजकुमार को को होने के कारण उनका कुत्ता भी साथ में रहने के कारण कोढ़ ग्रस्त हो गया था।

एक दिन कोढ़ ग्रस्त राजकुमार महानदी के तट पर टहल रहे थे, तब उनका कुत्ता एक कीचड़ युक्त गड्ढे में लोटने लगा और लोटकर अपने मालिक राजकुमार के पास आकर अपने शरीर को फटकारा जिसमें कुछ कीचड़ राजकुमार के शरीर में पड़ा।




जिस-जिस पर वह कीचड़ राजकुमार के शरीर पर पड़ा उस जगह का जख्म तुरन्त ठीक हो गया तथा कुत्ता कासंपूर्ण घाव भी ठीक हो गया, उसको देख कर राजकुमार उस कीचड़ में जाकर अपने पुरे शरीर में कीचड़ का लेप कर लिया जिससे राजकुमार के पुरे शरीर का कोढ़ जख्ग पूर्ण रूप से ठीक हो गया।


 कोढ़ समाप्त होते ही राजकुमार के हृदय में श्रद्धा जाग गई और मंदिरों का निर्माण प्रारंभ कर दिया, उस कीचड़ युक्त गड्ढे का नाम दिया अमृत कुण्ड जिसे बाद में राजकुमार कन्हार देव (कर्णदेव) ने लोहे के है परन्तु चादरों से सात परतो से ढक दिया।



जो बाद में मिट्टी एवं पत्थरों से बरसात के पानी से पूर्ण रूप से ढक चुका कर्णेश्वर ट्रस्ट ने यादगारी के लिये पत्थर से एक छोटा सा कुण्ड नुमा स्मारक बना दिया है।

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