शाँता माता गुफा (मंदिर) सिहावा। Shanta Mata Temple Sihawa- Nagri । जानिए माता जी के सम्पूर्ण पौराणिक कथा


शाँता माता मंदिर (गुफा ) सिहावा-नगरी ( Shanta Mata Temple Sihawa- Nagri) -


शांता माता मंदिर  जो की महेन्द्र गिरि पर्वत (सिहावा) के एक शिखर पर श्रृंगी आश्रम है, तो दुसरे शिखर पर शाँता माता का निवास स्थल है जो शाँता गुफा के नाम से जाना जाता है। धमतरी जिला मुख्यालय से लगभग 70 किमी के दूरी पर नगरी ब्लॉक तथा 7 किमी के अंतर्गत सिहावा (बितररास ) ग्राम पर माता जी की मंदिर (गुफा ) स्थित है । 


शाँता माता गुफा की खोज - 

शाँता गुफा की जानकारी पहले लोगों को नहीं थी परन्तु आज से लगभग 40 वर्ष पूर्व सन् 1975 में श्री श्रृंगी ऋषि के पुजारी रामेश्वर दास वैष्णव को रात्रि में स्वप्न हुआ कि पहाड़ी के उत्तर की ओर के शिखर पर एक गुफा है, जिसमें श्रृंगी ऋषि जी के पत्नी शाँता मैय्या का निवास स्थान है और यह स्वप्न महिने में दो तीन बार आने लगा और यह क्रम लगभग 6 महिने तक चला। स्वप्न की जानकारो पुजारी रामेश्वर दास जी ने अपने ग्राम भीतररस के प्रबुद्ध बुजुर्गों को दी, ग्रामवासियों ने यह बात अर्जी के माध्यम से माँ शीतला के समक्ष रखी और माँ शीतला के आर्शिवाद से और स्वप्न के बताये रास्ते के अनुसार ग्राम भितररास के बुजुर्गों तथा सत मुरली बाबा और पुजारी उक्त स्थान को खोज निकाला और सन् 1987 से दोनों नवरात्रि पर्व में अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करने का दायित्व शीतला समिति ने अपने कंधो पर ले लिया परन्तु दोनो पर्व में कार्य की व्यस्तता अधिक होने पर शाँता भैय्या के गुफा के सुरक्षा एवं व्यवस्था का दायित्व अब विगत 5-6 वर्षों से पुजारी वैष्णव परिवार को दे दिया गया है।


श्रृंगी ऋषि महाराज और शांता माता की पौराणिक कथा -


श्रृंगी ऋषि की पत्नि शाँता माता है यह निर्विवाद सत्य है। अयोध्या पति महाराज दशरथ कौशल नरेश भानुमति (कौशल्या) को ब्याहने छत्तीसगढ़ (कौशल प्रवेश आये) और विवाह वैदिक विधान के साथ भानुमति (कौशिल्या) के साथ-अग्नि के सात फेरे लेने लगे।

 देव योग से सातवें फेरे में विवाह यज्ञ कुण्ड से एक अद्भूत नवजात कन्या प्रगट हुई और आकाशवाणी हुई कि हे राजन इस कन्या को पुत्री के रूप में स्वीकार करों और समय आने पर इसी कन्या के माध्यम से तुम्हारे घर में परमात्मा का प्रादुर्भाव होगा।

महाराज दशरथ उस कन्या को विवाह के समय पुत्री के रूप में स्वीकार तो कर लेते है परन्तु लोक-लाज के भय से अर्थात् दुलहन (कौशिल्या) के साथ एक नन्ही बालिका को अयोध्या जाना अनुपयुक्त लगा और उस कन्या के लालन-पालन का दायित्व अंगदेश के राजा रोमपाद (उपनाम दशरथ) को सौपकर अयोध्या चले गये।

 उसी कन्या का नामकरण शाँता हुआ जो विवाह योग्य होने पर अर्थात् जिस समय अंगदेश में घोर अकाल होता है और श्रृंगी ऋषि महाराज के द्वारा वृष्टि यज्ञ किया जाता है, जिससे अगदेश में वर्षा होती है और अनुपम सुन्दर शाँता का विवाह ऋषि कुमार श्रृंग के साथ हो जाता है।

श्रृंगी ऋषि भगवान श्री राम का सिहावा पर आगमन -

रामायण  व कई धर्मिक ग्रंथो का जब हम पाठन करते है तो हमे इस सब से  हमे ज्ञात होता है की भगवान श्री राम महेन्द्र गिरि पर्वत में तीन बार आये थे। प्रथम बार बाल्यवस्था में अपनी माता कौशिल्या के साथ अपनी बहन के यहाँ पहुना बनकर आये थे। दुसरी बार चौदह वर्ष के वनवास काल में दस वर्ष से अधिक समय सिहावा क्षेत्र में बिताए थे उस समय कुछ दिन श्रृंगी ऋषि आश्रम में निवास किये थे तथा महानदी उद्गम स्थल (गणेश पाट) पर स्नान कर नदी के किनारे चट्टान पर अभिषेक किये थे जिसका प्रमाण आज भी विद्यमान है तथा तीसरी बार राज्याभिषेक के पश्चात् श्री राम अपने अनुजों सहित तीनों माताओं के साथ तीर्थ यात्रा तथा सत्संग हेतु आए थे और कुछ दिन श्रृंगी आश्रम में रुके थे ।

शांता माता का आयोध्या जाना -

महर्षि वशिष्ठ के कथनानुसार महाराज दशरथ अश्व मेघ यज्ञ एव पुत्रेष्ठि यज्ञ का आयोजन करते हैं, जिसमें श्रृंगी ऋषि बाबा स्वयम् आहुति देने वाला बनकर यज्ञ करवाते है। जब महाराज दशरथ श्रृंगी ऋषि जी के पास यज्ञ का निमंत्रण देने आते हैं, तब माँ शाँता जी श्रृंगी ऋषि बाबा को अयोध्या जाने के लिए प्रेरित करती है और बाबा श्रृंगी ऋषि के साथ शाँता भी यज्ञ में अयोध्या जाती है और लगभग 2 वर्षों तक अयोध्या रुकी रही। 

सिहावा नगरी क्षेत्र ऋषि मुनियो का तपस्या स्थल रहा है . जो आज भी उस स्थान का किसी को भी ज्ञात नही हो पाया है -

शिवपुराण के कथा अनुसार महेन्द्र गिरि पर्वत में श्रृंगी ऋषि शाँता मैय्या का तपस्या स्थल ही नहीं अपितु इस पर्वत पर चारों ऋषि कुमार (सनत, सननदन, सनातन, सनतकुमार) दुर्वासा मुनि, परशु राम, विभाण्डक मुनि का भी तपस्या स्थली रही। परशु राम जी के तपस्या गुफा आज भी विद्यमान है। 

 वहाँ तक पहुँचना आम आदमी के लिए बहुत कष्टदायक है । और दुर्गम चट्टानों एवं कन्दराओं से घुटनों के बल चलकर पहुँचना पड़ता है। सनत कुमारों एवं दर्वाशाऋषि तथा विभाण्डकऋषि तपस्या की जानकारी लागो को अभी तक नहीं हो पायी है।

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