श्रृंगी ऋषि आश्रम सिहावा- नगरी।Shringi Rishi Aashram Shihawa -Nagri (Dhamtri)



 महेंद्रगिरि पर्वतमाला श्रृंगीऋषि आश्रम सिहावा 
नगरी (जिला -धमतरी छ॰ग॰)



श्री श्रृंगीऋषि आश्रम सिहावा-छत्तीसगढ़ -

श्रृंगीऋषि पर्वतमाला का प्राचीन नाम ही महेंद्रगिरि पर्वतमाला है,जो की छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला मुख्यालय से 70 किमी दूरी पर नगरी ब्लॉक से 7 किमी अंतर्गत ग्राम -भितररास(सिहावा) मे महेंद्र गिरि पर्वत माला पर श्रृंगीऋषि आश्रम स्थित है। 

श्रृंगी ऋषि का आश्रम भारत में कई जगहों का उल्लेख मिलता है जैसे उत्तर प्रदेश में श्रृंगबेर पुर राजस्थान में भीलवाड़ा सिहावा में महेन्द्र गिरि पर्वत में आदि महेन्द्र गिरि पर्वत को सूक्ति माला पर्वत भी कहा गया है।

श्रृंगी ऋषि आश्रम प्रवेश द्वार की विशेषता -

श्रृंगी ऋषि आश्रम पर्वत के उच्च श्रेणी मे स्थित होने के कारण आश्रम जाने के लिए सीढ़ियो के माध्यम से जाना(चढ़ना) पडता है। जैसे ही आश्रम पहुच मार्ग से जाते है,तो सबसे पहले सीढ़ियो के समीप दो शेर की बने मूर्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है की ये शेर ही श्रृंगी ऋषि महाराज जी के रक्षक है। चुकी प्राचीन समय के कई कथाओ मे भी सुनने को मिलता है।


श्रृंगी ऋषि जी के आश्रम जाने तक के सीढ़ियो का विशेषता -

कहा जाता है की,अगर कोई भी श्रद्धालु बड़े ही श्रद्धा पूर्वक बाबाजी के पास आश लगाए  कोई अपना दुख या कुछ भी मानशिक तनाव पर रहता है।और इस सीढ़ियो के रास्ते से जाता है भले ही उनको कष्ट वा थकान होती जरूर है । लेकिन जैसे है आश्रम के पहुचते ही सारे थकान वा आपको शांति मिलेगी येसा प्रेक्टिकल रूप से भी देख सकते है । येसी मान्यता है इस सीढ़ियो की । 

पुराणों व प्राचीन गर्न्थों में श्रृंगीऋषि महराज जी की कई सारे कथा सुनने को मिलते है-

त्रेतायुग तथा द्वापर युग की समय की कथाओ से प्रमाण मिलते है । त्रेतायुग मे श्रृंगी ऋषि महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक तथा विभाण्डक के पुत्र श्रृंगी ऋषि तथा द्वापर युग के अंत में जो श्रृंगी ऋषि हुए वे समीक ऋषि के पुत्र थे।जो पांडव पुत्र (अर्जुन) पुत्र अभिमन्यु के पुत्र राजा परिक्षित को श्राप दिये थे कि आज से सात दिन पश्चात् तक्षक सर्प के काटने से तुम्हारी मृत्यु होगी।

हम इस लेख जो श्रृंगी ऋषि की चर्चा करने जा रहे हैं वे त्रेता युग के श्रृंगी ऋषि के प्रमाण इस महेन्द्र गिरी पर्वत माला से मिलती है। जैसे त्रेता युग के श्रृंगी ऋषि की पत्नि शांता महानदी की उत्पत्ति कथा महाराज दशरथ द्वारा पुत्रेष्ठि यज्ञ के लिए श्रृंगी ऋषि को आमंत्रण आदि के प्रमाण मिलते हैं।

श्रृंगीऋषि महराजजी का पौराणिक कथा -

सत्योपाख्यान नामक ग्रंथ के अनुसार -

श्रृंगी ऋषि का जन्म भारत भूमि में उत्तर प्रदेश के श्रृंगवेरपुर नामक स्थान में हुआ था। कथा है कि एक बार विभाण्डक ऋषि भूमि को खोदकर गले तक गहरे स्थान बनाकर समाधी लगा लिये और कुछ समय (दिन) तक समाधिस्थ रहे तथा समाधिस्थ स्थिति में ही विमाण्डक ऋषि के वीर्य (पुरुषत्व) स्खलित हो गया, जिनकी जानकारी विभाण्डक ऋषि को नहीं हुआ। 

जब उनका ध्यान समाधि से टूटा तो स्नान आदि से निवृत्त हुए और पहने हुए लंगोट को धूप में डाल दिये संयोग और देव योग से जंगल की मृग घास चरते चरते उसी लगोट को सुँघ लेती है और मृग स्वभाववस उस लगोट को अपने मुंह और शरीर से इधर उधर हिलाती है जिससे लंगोट का वह हिस्सा जहाँ ऋषि का पुरूषत्व लगा रहता है वह मृग के योनि द्वार तक पहुंच जाता है यह ईश्वर की कृपा कहा जाय जिससे मृगी गर्भावस्था में आ जाती है और समय आने पर मृग एक मानव संतान को जन्म देती है,

जिसके सिर पर एक छोटा सिंग था, जब ऋषियों ने ध्यान करके देखा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि यह अनहोनी घटना है और विभाण्डक ऋषि ने उस बालक को पुत्रवत पालन पोषण शिक्षा दीक्षा दिये तथा 25 वर्ष की उम्र तक वह बालक पिता के संरक्षण में रहे उसी बालक का नामकरण हुआ ऋषि श्रृंगी।

कथाकारों से सुनने को मिला है 

महाकौशल इतिहास के छत्तीसगढ़ के रामायण कथा के अनुसार 

श्रृंगी ऋषि महाराज महेन्द्र गिरी पर्वत में तपस्या रत थे। उसी समय अंगदेश (उड़िसा एवं राजस्थान, भीलवाड़ा) के राजा रोमपाद (अंगदेश के राजा रोमपाद का उपनाम दशरथ भी था) के राज्य में घोर अकाल पड़ा अनावृष्टि के कारण लोग त्राहि-त्राहि करने लगे तब अंगदेश के ज्योतिषाचार्य एवं देवर्षि नारद के परामर्श से श्रृंगी ऋषि महाराज द्वारा वृष्टि यज्ञ करवाने का परामर्श दिया क्योंकि नारद जी श्री ऋषि के तप एवं महिमा को जानते थे। 

तब राजा रोमपाद ने बड़ी मुश्किल से एन केन प्रकारेण सात वेश्याओं द्वारा भुलावे में डालकर श्रृंगी ऋषि को राजस्थान तक ले गये क्योंकि उसके पूर्व श्रृंगी ऋषि ने किसी महिला को नहीं देखा था। अंग देश में जाकर श्रृंगी ऋषि ने (सतकल्प द्रुम नामक ग्रंथ) परजन्य सूक्त के मंत्र से यज्ञ किया | परजन्य सूक्त के आह्वान एवं आहुति के पूर्व महर्षि श्रृंगी ऋषि महाराज की स्तुति की जाती है 

महर्षि श्रृंगी ऋषि द्वारा यज्ञ कराने से रोमपाद राजा उपनाम दशरथ के राज्य अंगदेश में वर्षा हुई। महाराज रोमपाद ने परम हर्षित होकर अपनी रूप गुण संपन्न पुत्री शांता का विवाह वैदिक विधि से महर्षि श्रणी ऋषि के साथ कर दिया। राजा रोमपाद की मित्रता अयोध्या के चक्रवती राजा दशरथ से था।

विवाह के समय अयोध्या के राजा दशरथ भी अपनी रानियों सहित आमंत्रित थे और कन्यादान दोनों राजा (रोमपाद और दशरथ) ने मिल कर किये। राजा रोमपाद का कोई पुत्र नहीं था। महर्षि श्रृंगी ऋषि की कृपा से पुत्रेष्ठि यज्ञ द्वारा उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।


श्रृंगी ऋषि महराजजी के सम्पूर्ण नाम -

  1. श्रृंगीऋषि
  2. ऋषियाश्री
  3. सप्तश्रृंगी
  4. नेगीश्रृंगी
  5. लिंगाश्रृंग
  6. मृगश्रृंगी
  7. श्रृंगाश्रृंग

 जन्मभूमि माँ भारत भूमि में आदिकाल से ही ऋषि मुनियों का प्रार्दुभाव समय-समय पर होता आ रहा है।और इस देश को अधर्म के रास्ते से हटाकर धर्म के रास्ते पर लाये हैं। 

नगरी- सिहावा के अंतर्गत  सप्त ऋषियों के आश्रम वा उनकी  कथा

श्री श्रृंगीऋषि आश्रम सिहावा

! श्री कुंभज ऋषि आश्रम डोंगरीपारा 

! श्री कर्क ऋषि आश्रम ठेमली बांसपानी 

! श्री सरभंग ऋषि आश्रम दलदली 

! श्री मुचकुंद ऋषि आश्रम मेचका 

! श्री आंगिरा ऋषि आश्रम रतावा 

! श्री अगस्त ऋषि आश्रम डुगली पारा देवपुर 

( भारत के मानचित्र में सिहावा की ओर देखते ही सभी का ध्यान श्रृंगी ऋषि की ओर आकृष्ट हो जाता है।)

श्रृंगी ऋषि महाराज जी की आरती 

श्रृंगी ऋषि महाराज जी की चालीशा


श्री श्रृंगीऋषि आश्रम सिहावा Photos -

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संबन्धित पोस्ट वा कथा देखे - 


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